केजरीवाल की जीत का देश की राजनीति पर प्रभाव
भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब इस देश की दिशा और दशा बदलने के लिए बड़े आंदोलन हुए हैं तब-तब उन आंदोलनों की ही दिशा बदल गई और इन आंदोलनों से देश को मिले कई नेता और राजनीतिक पार्टियां, इसके कई उदाहरण आज देश के सामने हैं। ऎसा ही एक आंदोलन देश में 2011 में हुआ था जिसे अन्ना हजारे की आंधी के नाम से जाना गया । अन्ना ने देश की कई समस्याओं के समाधान के लिए केन्द्र सरकार के खिलाफ देश के दिल, दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन किया, उनके समर्थन में पूरा देश सड़कों पर उतर आया, पूरे देश में भ्रष्टाचार, कालाधन, रिश्वतखोरी के खिलाफ आवाजें बुलंद हो रही थीं। अन्ना हजारे सरकार से जनलोकपाल बिल पास करने की मांग कर रहे थे।
अन्ना के आंदोलन में उनके सहयोग के लिए कई युवा तुर्क शागिर्द भी हर कदम पर उनके साथ खड़े थे, अन्ना की लरजती आवाज को अपनी तेज दहाड़ती आवाज के स्वर में स्वर मिला कर बुलंद कर रहे थे । इन्हीं तेज आवाजों में एक आवाज थी अरविंद केजरीवाल की... जी हां आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल... देश को एक नई राजनीति की दिशा दिखाने वाले केजरीवाल, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर जनसमस्याओं और मुद्दों की राजनीति करने वाले केजरीवाल...पार्टी की स्थापना के चंद दिनों मेें ही देश और दिल्ली के फलक पर छा जाने वाले केजरीवाल... आज केजरीवाल के सिर पर दिल्ली की गद्दी का ताज सज चुका है। वे दिल्ली के शहंशाह बन चुके हैं... दिल्ली देश का दिल है। देश के दिल में केजरीवाल ने एक नई राजनीति को जन्म दिया है, इसका प्रभाव देश की राजनीति पर क्या होगा, कितान होगा, ये आने वाला वक्त तय करेगा...
- केजरीवाल ने देश को दी एक अलग तरह की राजनीति
भारत में सालों से चली आ रही एक ही तरह की राजनीति को केजरीवाल ने एक नई रौशनी दी है वो रौशनी जो जनता को रौशन करने की दिशा की ओर ले जा रही है। जो धर्म, परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषाई आधार, खून-खराबे और प्रत्याशियों की दागदार छवि से मीलों दूर है। जो सिर्फ जनता की समस्याओं के समाधान पर आधारित, विकास कार्यो पर आधारित, और मुद्दों की राजनीति पर आधारित है, इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं, केजरीवाल ने प्रचार के नए तरीकों फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्स एप, व इंटरनेट के अन्य माध्यमों का भरपूर प्रयोग किया है ।
किरण बेदी को चर्चा के लिए आमंत्रित किया-
प्रचार के दौरान केजरीवाल की भाषा-शैली भी ऎसे थी जो नेताओं के पारंपरिक भाषण देने के अंदाज से बिल्कुल अलग थी, वो जनता से सीधे तौर पर संवाद जनता की ही भाषा में करते थे। केजरीवाल ने इस चुनाव में आप को मिले धन को पूरी पारदर्शित के साथ अपनी बेवसाइट के माध्यम से लोगों के सामने रखा, चंदा देने वाले लोगों का नाम बेवसाइट पर प्रकाशित किए, पार्टी को मिलने वाले फंड के सोर्सो की जानकारी देने की भी बात कही, विदेशों की तर्ज पर भाजपा से सीएम पद की प्रत्याशी किरण बेदी को एक सार्वजनिक मंच पर डिबेड(चर्चा) करने के लिए भी आमंत्रित किया। धर्म की राजनीति से पीछे हटते हुए दिल्ली में जाम मस्जिद के शाही इमाम द्वार आम आदमी पार्टी को वोट देने की अपील को खारिज कर दिया।
अपनी पार्टी के खास और बड़े नेताओं कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव व अपने रिश्तोदारों को चुनाव नहीं लड़वाया, डोर-टू-डोर जाकर लोगों से जनसंपर्क किया, दिल्ली के विकास का एक खाका तैयार करके जनता के सामने रखा, जनता अब पुरानी राजनीति की तरफ से किनारा कर रही है, वो समझ चुकी है कि अब सिर्फ उसे विकास करने वाला नेता चाहिए, काम करने वाला नेता चाहिए, वादे पूरे करने वाला नेता चाहिए, जनता को ऎेसा नेता की जरूरत नहीं है जो अपने वादों को एक "चुनावी जुमाला" कह कर टाल दें। अब जनता जाग रही है।
पीछली सरकार में गठबंधन के लिए की जनता से रायशुमारी-
केजरीवाल ने पीछली सरकार में जनता से रायशुमारी करके कांग्रेस का समर्थन लिया । ये मामला भले ही विवादास्पद ही सही, लेकिन केजरीवाल ने जनता के साथ जुड़ने की कोशिश तो जरूर की और सरकार बनाने से पहले जनता से राय ली, कि क्या हमें कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बनानी चाहि, यह एक नई शुरूआत थी, क्योंकि इस देश में इतनी राजनीतिक पार्टियां हैं कि गठबंधन की सरकार इस देश की नियति बन गई है और चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक पार्टियां अपनी मर्जी का गठनबंधन की सरकार बना लेती हैं और इसमें जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। आप ने रायशुमारी करके वर्तमान राजनीतिक दलों के सामने एक उदाहरण पेश किया है।
* केजरीवाल की जीत का मोदी सरकार पर प्रभाव
केजरीवाल की जीत से भाजपा का आत्म-विश्वास हिल गया है । जो पार्टी 30 साल में पहली बार प्रचंड बहुमत से देश की सत्ता में आई हो, जो हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के किले फतह करके सत्तानसीं हो गई हो, और जिसका नेता नरेंद्र मोदी-जैसा सशक्त हो, जिस पार्टी के देश भर से आए 120 सांसदों ने प्रचार किया हो उसके बाद भी हार का सामना करने पड़े तो ये वाकई अफसोस जनक है। आप की जीत का सीधा प्रभाव मोदी की हैसियत पर पड़ा है। छोटे-से केंद्र-शासित राज्य के चुनाव में भाजपा की इज्जत दांव पर लगा गई, अनेक सांसदों और मंत्रियों को भी प्रचार के लिए झोंक दिया। भाजपा की हार इन मोदी व भाजपा के कई अन्य नेताओं की अखिल भारतीय हैसियत पर प्रश्न-चिन्ह लगा रही है।
केजरीवाल की जीत देश के लिए एक अच्छा संकेत है, ये भाजपा के लिए एक ठोकर की तरह है, इससे मोदी सरकार को सीख मिलेगी, अब भाजपा जैसी पिछले आठ-दस महिनों से चल रही है, वैसी नहीं चलेगी। उसकी चाल बदल जाएंगी, उसका लोकतांत्रीकरण बढ़ेगा। उसके बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं की पूछ-परख बढ़ जाएगी। अभी आम जनता का मोदी सरकार से जो मोह-भंग शुरू हुआ है, इसमें कमी आएगी, भाजपा नेताओं की नींद खुलेगी। आप नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार पर अंकुश का काम करेगी। मोदी का पिछले आठ महिने से चला आ रहे हनीमून रूपी विदेश दौरों भी कम होंगे। जो भाजपा, देश और भारतीय लोकतंत्र- तीनों के लिए बहुत फायदेमंद होगा। मोदी सरकार का जितना प्रखर विरोध होगा, वह उतनी मुस्तैदी से काम करेगी। विपक्षी भूमिका होती भी यही है।
आम आदमी पार्टी मोदी सरकार के लिए अप्रत्यक्ष रूप से एक विपक्ष ही है। इसीलिए तो उसकी दमदार मौजूदगी जरूरी है। तब केंद्र सरकार के सांसद और मंत्री घर वापसी, चर्चो पर हमले, गोडसे-वंदन और चार बच्चों जैसे अन्य विवादित मुद्दों पर चुप बैठेंगे, और सरकार भी ऎसे नेताओं के खिलाफ कुछ एक्शन लेगी। केंद्र को कजेरीवाल की मांगों को लेकर आए दिन उसके नखरे झेलने ही होंगे, आए दिन केन्द्र सरकार से अपनी मांगे पूरी कराने के लिए जन-आंदोलन भी होते रहेंगे। कोई आश्चर्य नहीं कि "आप" ही देश के थके-मांदे विपक्ष का नेतृत्व करने लगे।
*क्या केजरीवाल भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए आशा की किरण हो सकते हैं ?
हो सकता है केजरीवाल विपक्षी पार्टियों कोआशा कि किरण बन कर नजर आने लगे, उन्हें शायद तीसरा मोर्चा बनाने की कोई जरूरत न पडे और सभी पार्टियां आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर एक नया मोर्चा खड़ा कर दें। कांग्रेस भले ही संसद में सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर बैठी रहे, लेकिन जनता के बीच आम आदमी पार्टी ही असली विपक्ष के रूप विकल्प होगी। दिल्ली का यह चुनाव देश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। कई राजनीतिक पार्टियां भले ही तीसरे मोर्चे की बात कर रही हों, लेकिन इनकी आपसी खींचातानी ने तीसरे मोर्चे को बनने से पहले ही ग्रहण लगा दिया था। आम आदमी पार्टी के आने के बाद इस बात की संभावना प्रबल हो गई है कि तीसरा मोर्चा का गठन हो सकता है ।
* आम आदमी पार्टी ने स्थापना के कुछ वर्षो में ही देश की राजनीति में दी दमादर दस्तक
आम आदमी पार्टी की स्थापना 26 नवंबर 2012 को हुई, स्थापना के लगभग एक वर्ष बाद पार्टी ने दिल्ली विधानसभा -2013 का चुनाव लड़ा, जिसमें उसने 28 सीटें जीतीं, और कांग्रेस ेका समर्थन लेकर 49 दिन की सरकार बनाई, जिसमें केजरीवाल सीए बने, पार्टी के सदस्य चुनावी मैदान में बिल्कुल नए थे, पार्टी ने अपनी शुरूआत एक विधान सभा का चुनाव लडकर की और पूरे देश में अपना संगठन बनाया, महज एक साल में लोकसभा चुनाव में पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और चार सीटें भी जीतीं, आम आदमी पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय छवि बनाई है,
कुल मिला कर आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति को कई तरह से प्रभावित किया है। इसने राजनीति का सामान्यीकरण किया, मुद्दों का सरलीकरण किया, जाति-धर्म आधारित राजनीति को खारिज किया और सबसे महत्वपूर्ण बात कि इसने जनता की भूमिका को काफी हद तक बढ़ाया है। इस पार्टी का राजनीतिक प्रभाव का अभी तो अनुमान हीं लगाया जा सकता , लेकिन आगामी कुछ चुनावों में इसका प्रभाव को स्पष्ट तौर पर दिख जाएगा। अब भारतीय राजनीतिक के एक नए युग की शुरूआत की संभावना प्रबल हो गई है, लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि आम आदमी पार्टी अपनी वर्तमान छवि को धूमिल होने से बचाए और सत्ता के लिए किए जाने वाले संघर्ष को जनता के लिए किए जाने वाले संघर्ष के रूप में तब्दील करे ।
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